शनिवार, 6 जुलाई 2013

दर्द

ये कौन जा रहा है, मेरा गाँव छोड़ कर... आँखोँ ने रख दिये हैँ समुन्दर निचोड़ कर...। मैँ अपनी शक्ल ढूँढ़ता रहा रात-दिन... कभी आईने तोड़ कर कभी आईने जोड़ कर...। आँधी का कोई खौफ न खतरा हवाओँ का... मैँने दिये बनाये हैँ सूरज को तोड़कर...। वो खत तो तुझको मिल गया होगा मेरे सनम... सब कुछ लिखा है जिसमेँ तेरा नाम छोड़ कर...।

kuch sher o shayri

१. मेरे घर मैं अँधेरा है तो कोई बात नहीं.....
    तेरे घर के उजाले से मेरे दिल में तो रौनक है…

२. आज प्यार की परिभाषा भूल गए हैं लोग,
    गुरुर मे अपने प्यार की भाषा भूल गए हैं लोग….
    छिछोरेपन को वो प्यार कहा करते हैं,
    सच्चे प्यार की अभिलाषा भूल गए हैं लोग।

३. तपते सेहरा की कहानी पर भी लिख सकता है…
    बहते दरिया की रवानी पर भी लिख सकता है….
    दिल के जज्बात को कागज की जरुरत क्या है…
    लिखने वाला तो कीबोर्ड से ही कहानी लिख सकता है…

४.  जिन्दगी को ढूढने में जिन्दगी जाती रही,
     इस तरेह घेर गमो ने हर ख़ुशी जाती रही।
     उससे बिछुड़ कर हाल मेरा कुछ ऐसा हुआ,
     श्याम के होंठो से जैसे बांसुरी जाती रही।

Bebafai

वो आते तो हैं मेरे सामने से, मगर जाते नहीं हैं,
क्यूकी मुझे अपना दूसरा पहलू  दिखाते नहीं हैं।

दुःख बहुत होता है, उनकी इस बात को सुनकर,
जब वो मुझसे कहते हैं कि हम तुमसे कुछ भी छुपाते नहीं हैं।

यही आलम हमारी जिन्दगी का होता है दोस्तों,
एक पहलू तो हम समझ लेते हैं, दूसरा समझ पाते नहीं हैं।

सह लेते हैं अपनों के दिए दर्द को हंसकर,
हम भी अपना दर्द किसी को जताते नहीं हैं।

लोग जालिम बहुत हैं इस ज़माने में दोस्तों,
दर्द तो देते हैं लेकिन कभी हंस्हते नहीं हैं।

दुनियाँ  में बेवफाई इस कदर है "जगजीत",
कि लोग बेवफाई भी बफदारी से निभाते नहीं हैं।

ये लेखक क्या है

न ये कवि है,न शायर है, न आशिक है,न दीवाना है।
ये तो एक शमाँ को ढूढ़ता हुआ, पतंगा है, परवाना है।

कहा शमाँ है, कहा प्यार इन सब से अबतक अंजाना है।
अभी अभी तो घर से निकला है, अभी दुनिया से बेगाना है।

ये नहीं जनता गीत, गजल क्या, क्या होती है ये कविता,
ये तो सोचता इन सबको ,की ये सब एक तराना है।

ये सब कुछ यूँ ही लिखता है, बस हक़ीक़त को अपने शब्दों में,
और लोग कहते हैं, कि "जगजीत" तेरा लिखने का अंदाज शायराना है।