न ये कवि है,न शायर है, न आशिक है,न दीवाना है।
ये तो एक शमाँ को ढूढ़ता हुआ, पतंगा है, परवाना है।
कहा शमाँ है, कहा प्यार इन सब से अबतक अंजाना है।
अभी अभी तो घर से निकला है, अभी दुनिया से बेगाना है।
ये नहीं जनता गीत, गजल क्या, क्या होती है ये कविता,
ये तो सोचता इन सबको ,की ये सब एक तराना है।
ये सब कुछ यूँ ही लिखता है, बस हक़ीक़त को अपने शब्दों में,
और लोग कहते हैं, कि "जगजीत" तेरा लिखने का अंदाज शायराना है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें